सेहुंडा की रामलीला में अपनों की कूटनीति,मां की जिद,बाप का वचन और बेटे के त्याग से दर्शकों में रोमांच

प्रयागराज! यमुनानगर तहसील बारा अंतर्गत विकासखण्ड जसरा क्षेत्र स्थित
सेहुंडा गांव की रामलीला में जैसे ही राम वनवास की लीला का मंचन शुरू हुआ, पंडाल में बैठे हजारों लोगों की सांसें थम गईं।
ढोलक की थाप रुकी, लाइट धीमी हुई और मंच पर अंधेरा कोपभवन सामने आया।मंथरा ने कैकेई के कान में जहर घोला काल्हि राम राजा बनिहैं, तोहार भरत नौकर बनिहैं! बस फिर क्या था?
महारानी कैकेई ने हार-मोती तोड़ कर फेंक दिए,जमीन पर बैठ गईं।महाराज दशरथ हाथ में राम के राज्याभिषेक का मुकुट लेकर खुशी-खुशी आए और बोले-कैकेई, आज मांग लो क्या चाहिए और ,कैकेई गरजी-पहला वर-मेरा भरत अयोध्या का राजा बनेगा ! दूसरा वर -राम को 14 वर्ष का वनवास !इतना सुनते ही दशरथ सिंहासन से धड़ाम से नीचे गिर पड़े।
मंच पर दशरथ बने कलाकार की ऐसी चीख निकली कि दर्शकों में सन्नाटा छा गया-हा कैकेई! तूने मेरे जीते जी मेरे राम को मार दिया!तभी मंच पर राम का आगमन हुआ सबको लगा अब बवाल होगा। पर राम ने हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए कहा-माता, आपने तो मुझे राज नहीं, वचन निभाने का मौका दिया है।
पिता का वचन और आपका आदेश, दोनों मेरे सिर-माथे पर। भरत मेरा भाई नहीं, मेरा प्राण है, वो राजा बनेगा तो मुझे खुशी होगी। यह सुनते ही पंडाल में जय श्रीराम के नारे गूंज उठे। कई बुजुर्गों की आंखों में आंसू थे।राम अकेले नहीं गए।
सीता दौड़कर आईं और वल्कल वस्त्र पहनते हुए बोलीं - स्वामी,सोने के महल से बड़ी आपकी पर्णकुटी है, मैं साथ चलूंगी।" लक्ष्मण ने धनुष उठाकर कसम खाई-भैया, जिस वन में कांटा आपके पैर में चुभेगा, वो पहले मेरे सीने में चुभेगा!
रथ जब अयोध्या की सीमा छोड़ रहा था, तो मंच पर कौशल्या-सुमित्रा का विलाप ऐसा था कि कई महिलाएं सच में रोने लगीं।फिर आया श्रृंगवेरपुर का घाट।निषादराज गुह दौड़कर आयें, राम के चरण धोए और गंगा पार कराई। केवट प्रसंग पर लोगों ने तालियां बजाईं।
भारद्वाज ऋषि के आश्रम में आशीर्वाद लेकर जब तीनों चित्रकूट पहुंचे और मंदाकिनी के किनारे कुटिया बनाई, तो लगा जैसे सेहुंडा ही चित्रकूट बन गया हो।
राम ने मंदाकिनी का जल हाथ में लेकर कहा-आज से यही हमारी अयोध्या है।पर्दा गिरा तो पंडाल में देर तक सन्नाटा रहा, फिर एक साथ गूंज उठा - बोलो सियावर रामचंद्र की जय !मंचन इतना सजीव था कि लगा जैसे त्रेता युग आंखों के सामने लौट आया हो।
सेहुंडा गांव की रामलीला में जैसे ही राम वनवास की लीला का मंचन शुरू हुआ, पंडाल में बैठे हजारों लोगों की सांसें थम गईं।
ढोलक की थाप रुकी, लाइट धीमी हुई और मंच पर अंधेरा कोपभवन सामने आया।मंथरा ने कैकेई के कान में जहर घोला काल्हि राम राजा बनिहैं, तोहार भरत नौकर बनिहैं! बस फिर क्या था?
महारानी कैकेई ने हार-मोती तोड़ कर फेंक दिए,जमीन पर बैठ गईं।महाराज दशरथ हाथ में राम के राज्याभिषेक का मुकुट लेकर खुशी-खुशी आए और बोले-कैकेई, आज मांग लो क्या चाहिए और ,कैकेई गरजी-पहला वर-मेरा भरत अयोध्या का राजा बनेगा ! दूसरा वर -राम को 14 वर्ष का वनवास !इतना सुनते ही दशरथ सिंहासन से धड़ाम से नीचे गिर पड़े।
मंच पर दशरथ बने कलाकार की ऐसी चीख निकली कि दर्शकों में सन्नाटा छा गया-हा कैकेई! तूने मेरे जीते जी मेरे राम को मार दिया!तभी मंच पर राम का आगमन हुआ सबको लगा अब बवाल होगा। पर राम ने हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए कहा-माता, आपने तो मुझे राज नहीं, वचन निभाने का मौका दिया है।
पिता का वचन और आपका आदेश, दोनों मेरे सिर-माथे पर। भरत मेरा भाई नहीं, मेरा प्राण है, वो राजा बनेगा तो मुझे खुशी होगी। यह सुनते ही पंडाल में जय श्रीराम के नारे गूंज उठे। कई बुजुर्गों की आंखों में आंसू थे।राम अकेले नहीं गए।
सीता दौड़कर आईं और वल्कल वस्त्र पहनते हुए बोलीं - स्वामी,सोने के महल से बड़ी आपकी पर्णकुटी है, मैं साथ चलूंगी।" लक्ष्मण ने धनुष उठाकर कसम खाई-भैया, जिस वन में कांटा आपके पैर में चुभेगा, वो पहले मेरे सीने में चुभेगा!
रथ जब अयोध्या की सीमा छोड़ रहा था, तो मंच पर कौशल्या-सुमित्रा का विलाप ऐसा था कि कई महिलाएं सच में रोने लगीं।फिर आया श्रृंगवेरपुर का घाट।निषादराज गुह दौड़कर आयें, राम के चरण धोए और गंगा पार कराई। केवट प्रसंग पर लोगों ने तालियां बजाईं।
भारद्वाज ऋषि के आश्रम में आशीर्वाद लेकर जब तीनों चित्रकूट पहुंचे और मंदाकिनी के किनारे कुटिया बनाई, तो लगा जैसे सेहुंडा ही चित्रकूट बन गया हो।
राम ने मंदाकिनी का जल हाथ में लेकर कहा-आज से यही हमारी अयोध्या है।पर्दा गिरा तो पंडाल में देर तक सन्नाटा रहा, फिर एक साथ गूंज उठा - बोलो सियावर रामचंद्र की जय !मंचन इतना सजीव था कि लगा जैसे त्रेता युग आंखों के सामने लौट आया हो।
रिपोर्ट: बालेंद्र कुमार शुक्ला (बलराम), विशेष संवाददाता, बारा/ प्रयागराज
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